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वैद्यनाथ मंदिर

  • 2019-12-20

भारत के राज्य झारखंड में अतिप्रसिद्ध देवघर नामक स्‍थान पर स्थित है वैद्यनाथ मंदिर | भगवान शिव को समर्पित यह एक पवित्र मंदिर है जिसे वैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे भगवान शिव का निवास माना जाता है। मंदिर परिसर में 20 अन्य आकर्षक मंदिर भी स्थित है। लोग अपने मन की शांति के लिए यहाँ आते हैं | यह मंदिर अद्भुत शांति देने वाला है |
 
बैद्यनाथ स्थित होने के कारण इस स्‍थान को देवघर नाम मिला है। साथ ही सती का हृदय गिरने के कारण प्रमुख शक्ति पीठ भी  है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस कारण यह लिंग "कामना लिंग" भी कहा जाता हैं। 
 
देवघर मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा :-
एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा माँगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा। अन्ततोगत्वा वही हुआ। रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक अहीर जिनका नाम बैजनाथ भील था , को थमा लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया। इधर उन अहीर भील ने ज्योतिर्लिंग को बहुत अधिक भारी अनुभव कर भूमि पर रख दिया। फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अँगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। इधर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की वहीं उसी स्थान पर प्रतिस्थापना कर दी और शिव-स्तुति करते हुए वापस स्वर्ग को चले गये। जनश्रुति व लोक-मान्यता के अनुसार यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है।
 
बाबा बैद्यनाथ मंदिर के खुलने का समय  :– 
बाबा बैद्यनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग की पूजा सुबह 4:00 बजे शुरू होती है।
सुबह 4:00 बजे से 5:30 बजे तक सरकार पूजा होती है।
पूजा अनुष्ठान दोपहर 3:30 बजे तक जारी रहता है, इसके बाद मंदिर बंद हो जाता है।
.यहां आने वाले लोगों के लिए मंदिर शाम 6:00 बजे तक खुला रहता है और इसके बाद पूजा फिर से शुरू होती है। इस समय मंदिर में श्रृंगार पूजा होती है।
इसके बाद मंदिर रात 9 बजे फिर से बंद कर दिया जाता है।
 
मन्दिर के मुख्य  आकर्षण:-
देवघर का शाब्दिक अर्थ है देवी-देवताओं का निवास स्थान। देवघर में बाबा भोलेनाथ का अत्यन्त पवित्र और भव्य मन्दिर स्थित है। हर साल  श्रावण के महीने में स्रावण मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्धालु "बोल-बम!" "बोल-बम!" का जयकारा लगाते हुए बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने आते है। ये सभी श्रद्धालु सुल्तानगंज से पवित्र गंगा का जल लेकर लगभग सौ किलोमीटर की अत्यन्त कठिन पैदल यात्रा कर बाबा को जल चढाते हैं।
 
मन्दिर के समीप ही एक विशाल तालाब भी स्थित है। बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मन्दिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मन्दिर भी बने हुए हैं। बाबा भोलेनाथ का मन्दिर माँ पार्वती जी के मन्दिर से जुड़ा हुआ है।
 
पवित्र यात्रा:-
बैद्यनाथ धाम की पवित्र यात्रा श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में शुरु होती है। सबसे पहले तीर्थ यात्री सुल्तानगंज में एकत्र होते हैं जहाँ वे अपने-अपने पात्रों में पवित्र गंगाजल भरते हैं। इसके बाद वे गंगाजल को अपनी-अपनी काँवर में रखकर बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ की ओर बढ़ते हैं। पवित्र जल लेकर जाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह पात्र जिसमें जल है, वह कहीं भी भूमि से न सटे।
 
वासुकिनाथ मन्दिर:-
वासुकिनाथ अपने शिव मन्दिर के लिये जाना जाता है। वैद्यनाथ मन्दिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक वासुकिनाथ में दर्शन नहीं किये जाते। (यह मान्यता हाल फ़िलहाल में प्रचलित हुई है। पहले ऐसी मान्यता का प्रचलन नहीं था। न ही पुराणों में ऐसा वर्णन है।) यह मन्दिर देवघर से 42 किलोमीटर दूर जरमुण्डी गाँव के पास स्थित है। यहाँ पर स्थानीय कला के विभिन्न रूपों को देखा जा सकता है। इसके इतिहास का सम्बन्ध नोनीहाट के घाटवाल से जोड़ा जाता है। वासुकिनाथ मन्दिर परिसर में कई अन्य छोटे-छोटे मन्दिर भी हैं।
 
बैजू मन्दिर:-
बाबा बैद्यनाथ मन्दिर परिसर के पश्चिम में देवघर के मुख्य बाजार में तीन और मन्दिर भी हैं। इन्हें बैजू मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इन मन्दिरों का निर्माण बाबा बैद्यनाथ मन्दिर के मुख्य पुजारी के वंशजों ने किसी जमाने में करवाया था। प्रत्येक मन्दिर में भगवान शिव का लिंग स्थापित है।
 
वैद्यनाथधाम में महाशिवरात्रि व पंचशूल की पूजा:-
विश्व के सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दीखता है मगर वैद्यनाथ धाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं।
यहाँ प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि से 2 दिनों पूर्व बाबा मंदिर, माँ पार्वती व लक्ष्मी-नारायण के मंदिरों से पंचशूल उतारे जाते हैं। इस दौरान पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। सभी पंचशूलों को नीचे लाकर महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व विशेष रूप से उनकी पूजा की जाती है और तब सभी पंचशूलों को मंदिरों पर यथा स्थान स्थापित कर दिया जाता है। इस दौरान बाबा व पार्वती मंदिरों के गठबंधन को हटा दिया जाता है। महाशिवरात्रि के दिन नया गठबंधन किया जाता है। गठबंधन के लाल पवित्र कपड़े को प्राप्त करने के लिए भी भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। महाशिवरात्रि के दौरान बहुत-से श्रद्धालु सुल्तानगंज से कांवर में गंगाजल भरकर 105 किलोमीटर पैदल चलकर और ‘बोल बम’ का जयघोष करते हुए वैद्यनाथधाम पहुंचते हैं।

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ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

  • 2019-12-05

ॐकारेश्वर मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है। नर्मदा नदी के मध्य ओमकार पर्वत पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर हिंदुओं की चरम आस्था का केंद्र है । ओम्कारेश्वर का यह शिव मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है और यहां पर मां नर्मदा स्वयं ॐ के आकार में बहती है नर्मदा के उत्तरी तट पर ओंकार पर्वत पर ओमकारेश्वर अत्यंत ही पवित्र व सिद्ध स्थान है । यह द्वीप हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार में बना है |
यहां दो मंदिर स्थित हैं।
1.ॐकारेश्वर
2.ममलेश्वर
 
ॐकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। 
 हिंदुओं में सभी तीर्थों के दर्शन पश्चात ओंकारेश्वर के दर्शन व पूजन विशेष महत्व है । तीर्थ यात्री सभी तीर्थों का जल लाकर ओमकारेश्वर में अर्पित करते हैं, तभी सारे तीर्थ पूर्ण माने जाते हैं अन्यथा वे अधूरे ही माने जाते हैं | 
अनेक अन्य मंदिरों के साथ ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा जी के दक्षिणी तट पर विराजमान है , द्वादश ज्योतिर्लिंग में उल्लेखित इसका प्राचीन नाम अमरेश्वर महादेव है संभवत वर्षा ऋतु बाढ़ इत्यादि के समय जब ओम्कारेश्वर पहुंचना संभव ना होता होगा तब इसके दर्शन से ही धर्मावलंबी संतुष्ट होते होंगे ।
 
इतिहास व पौराणिक मान्यता 
शास्त्रों के अनुसार कम से कम ५५०० वर्षों से ओंकारेश्वर अनवरत बसा हुआ है। पुराणों में किये गए उल्लेख से यह पता चलता है कि ओंकारेश्वर कई कालों से एक जाना माना हिन्दू तीर्थ स्थल है।

ऐसा माना जाता है कि सतयुग में जब श्री राम के पूर्वज, इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धता, नर्मदा स्थित ओंकारेश्वर पर राज करते थे, तब ओंकारेश्वर की चमक अत्यंत तेज थी। इसकी चमक से आश्चर्य चकित होकर नारद ऋषि भगवान् शिव के पास पहुंचे तथा उनसे इसका कारण पूछा। भगवान् शिव ने कहा कि प्रत्येक युग में इस द्वीप का रूप परिवर्तित होगा। सतयुग में यह एक विशाल चमचमाती मणि, त्रेता युग में स्वर्ण का पहाड़, द्वापर युग में तांबे तथा कलयुग में पत्थर होगा। पत्थर का पहाड़, यह है हमारे कलयुग का ओंकारेश्वर।

 
दूसरी कथा के अनुसार राजा मान्धाता ने यहाँ नर्मदा किनारे इस पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिवजी के प्रकट होने पर उनसे यहीं निवास करने का वरदान माँग लिया। तभी से उक्त प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ओंकार-मान्धाता के रूप में पुकारी जाने लगी। जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है। इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं।
 
 
ओंकारेश्वर में दर्शन का समय
ओंकारेश्वर में दर्शन करने का समय सुबह के दर्शन आप सुबह 5:30 बजे से दोपहर 12:20 तक और शाम के दर्शन 4 से रात10:00 बजे तक कर सकते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव व माता पार्वती यहां हर रात 'शयन' करते हैं और इसलिए यहां 'शयन आरती' की जाती है
 
ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग परिसर
ओम्कारेश्वर में नर्मदा नदी व कावेरी नदी  का संगम है | यहां यात्री स्नान कर धन्य हो जाते है। नदी को नाव द्वारा पर कर मंदिर परिसर में पहुते है। ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग परिसर एक पांच मंजिला इमारत है जिसकी प्रथम मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर का मंदिर है तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवी मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर है
ओमकारेश्वर मंदिर के  सभामंडप में  साठ  बड़े स्तंभ हैँ जोकि 15 फीट ऊँचे हैं | ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा या बनाया हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। प्राय: किसी मन्दिर में लिंग की स्थापना गर्भ गृह के मध्य में की जाती है और उसके ठीक ऊपर शिखर होता है, किन्तु यह ओंकारेश्वर लिंग मन्दिर के गुम्बद के नीचे नहीं है। इसकी एक विशेषता यह भी है। यहाँ सदेव घी का दीपक जलता रहा है |
 
ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग
ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्राचीन नाम अमरेश्वर मंदिर है। यह मंदिर भी पञ्च मंजिला मंदिर है हर मंजिल पर शिवालय है |  इस मंदिर प्रांगण में छह मंदिर और भी हैं | पत्थर के बेहतरीन काम वाला यह मंदिर अब पुरातत्व के अधीन है | देवी अहिल्या बाई के समय से यहाँ शिव पार्थिव पूजन होता रहा है | 
 
धनतेरस पूजन
इस मंदिर पर प्रतिवर्ष दिवाली की बारस की रात को ज्वार चढाने का विशेष महत्त्व है इस रात्रि को जागरण होता है तथा धनतेरस की सुबह ४ बजे से अभिषेक पूजन होता हैं इसके पश्चात् कुबेर महालक्ष्मी का महायज्ञ, हवन, (जिसमे कई जोड़े बैठते हैं, धनतेरस की सुबह कुबेर महालक्ष्मी महायज्ञ नर्मदाजी का तट और ओम्कारेश्वर जैसे स्थान पर होना विशेष फलदायी होता हैं) भंडारा होता है लक्ष्मी वृद्धि पेकेट (सिद्धि) वितरण होता है, जिसे घर पर ले जाकर दीपावली की अमावस को विधि अनुसार धन रखने की जगह पर रखना होता हैं, जिससे घर में प्रचुर धन के साथ सुख शांति आती हैं I इस अवसर पर हजारों भक्त दूर दूर से आते है व् कुबेर का भंडार प्राप्त कर प्रचुर धन के साथ सुख शांति पाते हैं I 
 
ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन की बुकिंग के लिए आप संपर्क कर सकते हैं info@religioustourism.com या कॉल करें +91 9111791117

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महाकालेश्वर - उज्जैन

  • 2019-11-16
  • ज्योतिर्लिंग

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग:-महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान् शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में से तीसरा ज्योतिर्लिंग है, जो मध्य प्रदेश राज्य में रुद्र सागर झील के किनारे  बसे  उज्जैन शहर में स्थित है | माकलेश्वर मंदिर स्थित होने से उज्जैन को महाकाल की नगरी भी कहा जाता है | यह मंदिर क्षिप्रा नदी के तट पर 6 ठी शताब्दी ईसा पूर्व निर्मित मंदिर है | महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को महाकाल कहने के पीछे यह मान्यता है की प्राचीन समय में सम्पूर्ण विश्व का मानक समय यहीं से निर्धारित किया जाता था | महाकालेश्वर  हिंदुओं के सबसे पवित्र और उत्कृष्ट तीर्थ स्थानों में से एक है। इस मंदिर में दक्षिण मुखी महाकालेश्वर महादेव भगवान शिव की पूजा की जाती है। महाकाल के यहां प्रतिदिन सुबह के समय भस्म आरती होती है। इस आरती की खासियत यह है कि इसमें मुर्दे की भस्म से महाकाल का श्रृंगार किया जाता है। इस जगह को भगवान शिव का पवित्र निवास स्थान माना जाता है। यहां पर आधुनिक और व्यस्त जीवन शैली होने के बाद भी यह मंदिर यहां आने वाले पर्यटकों को पूरी तरह से मन की शांति प्रदान करता है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह एक अत्यंत पुण्यदायी मंदिर है। माना जाता है कि इस मंदिर के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
 
 
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
मंदिर निर्माण तक तो पहुंचा जा सकता है। परंतु उसके पहले यह ज्योतिर्लिंग कब से है यहां आज भी कोई नहीं जान पाया है।महाकालेश्वर के इतिहास के बारे में बात करें तो बता दें कि सन 1107 से लेकर 1728 तक उज्जैन में यवनों का शासन रहा था। इस शासन काल में लगभग हिंदुओं की प्राचीन परम्पराएं लगभग नष्ट हो गई थी। इसके बाद मराठो ने 1690 में मालवा क्षेत्र में हमला कर दिया था। फिर 29 नवंबर 1728 में मराठा शासकों ने मालवा में अपना शासन कर लिया था। इसके बाद उज्जैन की खोया हुआ गौरव और चमक फिर से वापस आई इसके बाद यह साल 1731 से 1728 के बाद यह मालवा मालवा की राजधानी बनी रही। मराठो के अधिपत्य के समय यहां पर 2 बड़ी घटनाए हुई। पहली घटना यह थी कि पहले यहां पर स्थित महाकालेश्वर मंदिर का फिर से निर्माण किया गया और ज्योतिर्लिंग की ख़ोई हुई प्रतिष्ठा वापस मिली। इसके अलावा यहाँ सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना की गई जो बेहद खास उपलब्धि थी। आगे चलकर इस मंदिर का विस्तार राजा भोज द्वारा किया गया। 
 
महाकाल ज्योतिर्लिंग में दर्शन व आरती का समय:-बाबा महाकाल का मंदिर भक्तो के लिए सुबह चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक खुला रहता है | सबसे पहले सुबह 4 से 6 बजे तक बाबा महाकाल की भस्म आरती की जाती है | इसके बाद 7:30 से  08:15 ( ग्रीष्म ऋतू 07:00 से 07:45 ) तक बाबा की नैवेद्य आरती की जाती है | शाम को 06:30 से 07:00 ( 07:00 से 07:30 ग्रीष्म ऋतू ) बजे तक संध्या आरती की जाती है | इसके बाद रात में 10:30 को बाबा महाकाल की आरती की जाती है, इसके बाद 11:00 बजे मंदिर को बंद कर दिया जाता है | भक्तों के द्वारा महाकालेश्वर मंदिर में माहाकाल को प्रसाद के रूप में लड्डू का प्रसाद लगाया जाता है | आप चाहें तो ऑनलाइन बुकिंग करकर बाबा को प्रसाद अर्पित कर सकते है और आरती की बुकिंग भी कर सकते हैं |
 
 
 
वर्तमान मंदिर
महाकालेश्वर मंदिर मराठा, भूमिज और चालुक्य शैलियों की वास्तुकला का एक सुंदर और कलात्मक मेल है। यह पवित्र मंदिर एक झील के पास स्थित है जो विशाल दीवारों से घिरे हुए विशाल आंगन में स्थित है। बता दें कि इस मंदिर में पांच मंजिले हैं,इस मंदिर के परिसर में एक बड़ा कुंड भी है जिसको कोटि तीर्थ के रूप में जाना-जाता है। इस बड़े कुंड के बाहर एक विशाल बरामदा है, जिसमें गर्भगृह को जाने वाले मार्ग का प्रवेश द्वार है।गर्भ द्वार  पर चांदी से नक्काशी की गई है। गर्भगृह में  महाकाल के ऊपर सिद्ध यंत्र स्थापित है जिनके नीचे  जमीन के अंदर स्थित है। यहां पर महाकालेश्वर की विशाल मूर्ति गर्भगृह (जमीन के अंदर) में स्थित है और यह दक्षिणा-मूर्ति है, जिसका मतलब होता है दक्षिण दिशा की ओर मुंह वाली मूर्ति। यह खास बाते सिर्फ महाकालेश्वर मंदिर में पाई जाती है।गर्भ ग्रह मे महाकाल के बायें ओर श्री गणपति जी और दायें  ओर  कार्तिके  जी और उन दोनों के बीच में माता पार्वती जी विराजमान 1है।
गर्भगृह के बाहर नंदी जी की प्रतिमा स्थापित है |
 
महाकालेश्वर के इस सुंदर मंदिर के मध्य और ऊपर के 1हिस्सों में ओंकारेश्वर और नागचंद्रेश्वर के लिंग स्थापित हैं। लेकिन आप नागचंद्रेश्वर की मूर्ति दर्शन सिर्फ नाग पंचमी के अवसर पर ही कर सकते हैं क्योंकि केवल इसके इस खास मौके पर ही इसे आम जनता के दर्शन के लिए खोला जाता है। मंदिर में बरामदे के अनेक मंदिर स्थापित है।  जिसमे भगवान श्री राम,देवी अवंतिका ,नौ गृह आदि ।
 
महाकालेश्वर की पौराणिक कथा
शिवपुराण की कोटि  द्रसंहिता के 16 अध्याय में सूत जी महाराज द्वारा वर्णन किया गया है  कथा के अनुसार अवंती नगरी जिस जिससे हम उज्जैन के नाम से जानते हैं वहां वेद प्रिय नामक ब्राह्मण रहते थे वे अपने घर में अग्नि की स्थापना कर प्रतिदिन  अग्निहोत्र करते थे और प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग के निर्माण व शास्त्र विधि से पूजा अर्चना करते थे उन ब्राह्मण के चार पुत्र थे। वे सभी तेजस्वी व माता-पिता के सद्गुरु के अनुरूप थे  उन्हीं दिनों में रत्नमाल पर्वत  पर दूषण नामक  असुर ने भगवान  ब्रह्मा से अमर होने का वर प्राप्त करके उनने सबको सताने के बाद अंत में उन्होंने भारी सेना लेकर अवंती नगरी के पवित्र ब्राह्मणों पर भी चढ़ाई कर दी उसकी आसुरी शक्ति  से 4 भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रकट हो गए उसके भयंकर   प्रकोप से भी शिव पर विश्वास वे चारो  ब्राह्मण बंधु भयभीत नहीं हुए उसके बाद भी वे चारों ब्राह्मण बंधु शिवजी की पूजा करते रहे । सेना सहित दूषण ध्यान  मगन  उन चारों भाइयों के पास पहुंच गया।  और उन्हें चारों को पूजा करते देख कहीं लड़का ते हुए बोले पकड़कर मार डालो देव प्रिय के पुत्र उस सत्य के द्वारा कही गई बातों पर ध्यान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न  हो गए।
 
 जैसे ही उन दूतों ने जैसे ही  शस्त्र उठाए तो ही उसके द्वारा पूजित पार्थिव शिव में से आवाज के साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया और तत्काल उसमें से विकट और भयंकर रूप धारी  भगवान शिव प्रकट हुए  दुष्टों का विनाश करने तथा सज्जन मनुष्यों के कल्याण करने के लिए भगवान शिव ही  महाकाल के रूप में इस धरती पर विराजमान हुए।भगवान शिव कहने लगे    तुम जैसे दुष्टों  के लिए मैं महाकाल प्रकट हुआ इस प्रकार प्रकट हुए महाकाल की खूंखार मात्र से ही देत्य दूषण भस्म कर  हो गए और दुष्ट दूषण की सेवा भाग गई। शिव भक्त ब्राह्मणों पर भगवान शिव अति प्रसन्न होकर बोले कि तुम मुझसे कोई वर मांगो तब उन ब्राह्मणों ने भगवान शिव से कहां आप हमें मोक्ष  प्रदान करें और पृथ्वी पर सभी के कल्याण के लिए तथा रक्षा के लिए आप हमेशा के लिए यही विराजी भगवान शिव उन ब्राह्मणों को  मोक्ष प्रदान कर अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उसी गड्ढे  मैं विराजित हो गए।
 
 
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती 
महाकालेश्वर मंदिर में रोजाना होने वाली भस्म आरती सबसे खास होती है। यह आरती सुबह होने से पहले होती हैं जो भगवान् शिव को जगाने के लिए सुबह 4:00 बजे  की जाती है। इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान शमशान से लाई गई ताजी पवित्र राख से की जाती है, आरती का आयोजन करने से पहले राख को लिंगम में लगाया जाता है। आरती में शामिल होने वाले लोगो की खुशी और उल्लास की सबसे बड़ी वजह यह होती है कि यह आरती एकमात्र महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में ही की जाती है।
 
 
भस्म आरती के लिए बुकिंग कैसे करें 
अगर आप उज्जैन महाकालेश्वर के दर्शन के लिए जा रहे हैं और यहां की सबसे खास भस्म आरती में शामिल होना चाहते हैं तो बता दें कि यह आरती बहुत विशेष होती है। भस्म आरती महत्वता की वजह से कई घंटो पहले ही भक्त लाइन में लग जाते हैं, इसलिए आप इस आरती के लिए बुकिंग कर सकते हैं। बुकिंग के लिए संपर्क करें info@religioustourism.com या कॉल करें +91 9111791117
 
उज्जैन में स्थित प्रमुख स्थल 
 
(1)काल भैरव मंदिर :–
काल भैरव मंदिर महाकाल के संरक्षक काल भैरव को समर्पित है। यह शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। यह शहर के सबसे सक्रिय मंदिरों में से एक है, यहां रोजाना सैकड़ों भक्त आते हैं।
मंदिर में देवता को पांच तांत्रिक अनुष्ठानों में से एक के रूप में पंचमकार – माद्य (शराब), मानसा (मांस), मीना या मत्स्य मछली), मुद्रा (गर्भ या परिक्रमा) और मैथुना (संभोग) की पेशकश की जाती है। पुराने समय में, सभी पाँच आहुतियाँ देवता को दी जाती थीं, लेकिन अब केवल शराब ही चढ़ाया जाता है।
यहां पुजारी भक्त से बोतल लेता है, उसे खोलते है और तश्तरी में कुछ शराब डालते है और भैरव देवता के होठों के पास रखते है और शराब गायब हो जाती है। शेष बोतल प्रसाद के रूप में भक्त को सौंप दी जाती है।
 
(2)हरसिद्धि मंदिर :–
हरसिद्धि माता मंदिर शक्तिपीठ हैं।हरसिद्धि में सती की कोहनी गिरी थी, 1001 दीपकों में रोजजोत  जलाई जाती है ।
देवी हरसिद्धि की पूजा उज्जैन में बड़े समर्पण के साथ की जाती है क्योंकि उन्हें विक्रमादित्य की ‘ इष्टदेवी’ माना जाता है। इस मंदिर को ऊर्जा और शक्ति के स्रोत के रूप में जाना जाता है।
 
(3)अवंतिका देवी:-
 शहर में एक नहीं बल्कि दो-दो शक्तिपीठ हैं। पहला हरसिद्धि माता मंदिर तथा दूसरा अवंतिका देवी, जो, तथा अवंतिका देवी का मंदिर जिस स्थान पर है, वहां सती के होठ गिरे थे। इन देवी को अवंतिका यानी उज्जैन की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
 
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